बंगाल की राजनीति में नया समीकरण, उत्तर-पूर्व मॉडल से साधने की कोशिश
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की राजनीति अब केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच की पारंपरिक लड़ाई तक सीमित नहीं रह गई है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के साथ ही विपक्ष के बिखरने और आंतरिक कलह की एक ऐसी नई तस्वीर उभर रही है, जो देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों की राजनीतिक याद दिलाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में भाजपा का लक्ष्य सिर्फ सत्ता संभालना नहीं, बल्कि अपना वोट शेयर 50 फीसदी से ऊपर ले जाकर विपक्ष के वजूद को ही सिमटने पर मजबूर करना है।
टीएमसी में ऐतिहासिक बिखराव: 65 विधायक और 20 सांसद अलग
करीब डेढ़ महीने पहले सत्ता से बेदखल होते ही टीएमसी अपने इतिहास के सबसे बड़े संगठनात्मक संकट और अस्तित्व की लड़ाई से जूझ रही है। पार्टी में विभाजन की स्थिति यह है कि:
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विधायकों की बगावत: ऋतव्रत बनर्जी की अगुवाई में 65 विधायकों ने पार्टी से अलग होकर खुद को 'असली टीएमसी' घोषित कर दिया है। ये विधायक अब चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाकर मूल पार्टी पर अपना दावा ठोक रहे हैं।
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सांसदों का पलायन: टीएमसी के 20 सांसदों ने एक गुमनाम पार्टी के रास्ते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का दामन थाम लिया है।
इस बड़े बिखराव के बाद ममता बनर्जी के पास नाममात्र के विधायक और सांसद ही बचे हैं। वर्तमान में टीएमसी की मुख्य लड़ाई भाजपा से लड़ने के बजाय अपनी ही पार्टी के बागियों से कानूनी और राजनीतिक मोर्चे पर लड़नी पड़ रही है। इस शून्य का लाभ उठाकर भाजपा बिना किसी कड़े राजनीतिक विरोध के राज्य में अपने वैचारिक एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ा रही है।
सांसदों और विधायकों की राहें जुदा, ऋतव्रत बनर्जी ने खुद को बताया 'असली विपक्ष'
ममता बनर्जी से अलग हुए बागी गुटों के बीच भी वैचारिक और रणनीतिक तालमेल की कमी साफ नजर आ रही है। जहाँ अलग हुए 20 सांसद केंद्र में एनडीए खेमे के साथ चले गए हैं, वहीं ऋतव्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले 65 विधायक राज्य में खुद को 'असली विपक्ष' के तौर पर पेश कर रहे हैं।
जब मीडिया द्वारा ऋतव्रत बनर्जी से पूछा गया कि क्या एनडीए में गए सांसद भी उनके इस 'असली टीएमसी' वाले दावों के साथ हैं, तो उन्होंने इस पर चुप्पी साध ली। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि:
"टीएमसी खत्म नहीं हुई है, असली विपक्ष हम ही हैं। जनता से जुड़े अहम मुद्दे (जैसे SIR) हमारे लिए आज भी प्राथमिकता बने हुए हैं।"
परदे के पीछे 'ऑपरेशन बंगाल' और ममता के आरोप
टीएमसी में अचानक हुए इस अभूतपूर्व विभाजन को लेकर ममता बनर्जी लगातार भाजपा पर हमलावर हैं। उनका आरोप है कि यह टूट स्वाभाविक नहीं, बल्कि भाजपा की एक सुनियोजित और परदे के पीछे से संचालित रणनीतिक बिसात का हिस्सा है। हालांकि, भाजपा इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर रही है। इसके बावजूद, राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि बंगाल में ठीक उसी प्रयोग को दोहराया जा रहा है, जिसने उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में विपक्ष की राजनीति का स्वरूप ही बदल दिया था।
उत्तर-पूर्व के राज्यों में विपक्ष की वर्तमान स्थिति
राजनीतिक विश्लेषक बंगाल की मौजूदा स्थिति की तुलना उत्तर-पूर्व के उन राज्यों से कर रहे हैं जहाँ विपक्ष लगभग समाप्त हो चुका है या बेहद कमजोर स्थिति में है:
| राज्य | कुल विधानसभा सीटें | विपक्ष की मौजूदा स्थिति |
|---|---|---|
| नगालैंड | 60 | पूरा सदन सत्तापक्ष के साथ, विपक्ष पूरी तरह शून्य |
| सिक्किम | 32 | विधानसभा में विपक्ष का कोई अस्तित्व नहीं |
| अरुणाचल प्रदेश | 60 | विपक्ष नाममात्र का बचा है |
| असम | 126 | विपक्ष के पास सिमटकर सिर्फ 19 विधायक बचे |
| मेघालय | 60 | विपक्ष में केवल 9 विधायक शेष |
| मणिपुर | 60 | विपक्ष के पाले में सिर्फ 7 विधायक |
बदलाव से बड़ा राजनीतिक प्रयोग
यदि भाजपा बंगाल में अपना वोट आधार 50 प्रतिशत से ऊपर ले जाने में सफल रहती है और विपक्षी दल लंबे समय तक इसी तरह गुटबाजी में बंटे रहते हैं, तो राज्य का पूरा राजनीतिक ढांचा हमेशा के लिए बदल जाएगा। यही कारण है कि आगामी राजनीतिक घटनाक्रमों को केवल सरकार बदलने के तौर पर नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के एक बहुत बड़े और दूरगामी प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।
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