19 साल बाद तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी, 'कट्टरता विरोधी' कार्यक्रम रहेगा चर्चा में
कोलकाता: भारत और बांग्लादेश के साहित्यिक व राजनैतिक इतिहास से जुड़ी एक बेहद बड़ी और सनसनीखेज खबर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सामने आ रही है। अपने बेबाक लेखन के लिए दुनिया भर में मशहूर और हमेशा चर्चाओं में रहने वाली बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन लगभग 19 वर्षों (करीब दो दशक) के एक बेहद लंबे और दर्दनाक इंतजार के बाद एक बार फिर कोलकाता की धरती पर कदम रखने जा रही हैं।
वर्ष 2007 में उनके लेखन के खिलाफ शहर में हुए भीषण और हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें कानून-व्यवस्था का हवाला देकर बेहद नाटकीय परिस्थितियों में यहाँ से निष्कासित कर दिया गया था। अब अगले महीने वे कोलकाता के एक बेहद प्रतिष्ठित और बड़े मंच पर सार्वजनिक रूप से दिखाई देंगी। पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद बनी भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार इस पूरे घटनाक्रम को अपनी एक बहुत बड़ी वैचारिक व राजनीतिक जीत मान रही है। सरकार इसे धार्मिक कट्टरपंथ और तुष्टिकरण की राजनीति के सामने न झुकने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहाली के एक बड़े प्रतीक के रूप में पेश कर रही है।
रवींद्र सदन में 1 अगस्त को सजेगा कट्टरता विरोधी साहित्यिक मंच; खुद लेखिका ने सोशल मीडिया पर दी जानकारी
कोलकाता: तस्लीमा नसरीन की इस बहुप्रतीक्षित वापसी के कार्यक्रम की रूपरेखा तय हो चुकी है और इसकी तैयारियां प्रशासनिक स्तर पर जोरों से चल रही हैं:
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कविता पाठ से होगी शुरुआत: तस्लीमा नसरीन ने खुद अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के जरिए वैश्विक पाठकों को यह जानकारी दी है कि वे आगामी 1 अगस्त को कोलकाता के ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र 'रवींद्र सदन' में आयोजित होने वाले एक विशेष 'कट्टरता विरोधी साहित्यिक विमर्श' में मुख्य वक्ता के तौर पर भाग लेंगी। इस कार्यक्रम के दौरान वे अपनी कुछ नई और चर्चित कविताओं का पाठ भी करेंगी।
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नए बंगाल का उदय: कई धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक और कट्टरता विरोधी विचार रखने वाले संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किए जा रहे इस बड़े कार्यक्रम को लेकर 'पश्चिमबांगर जोन्नो' संस्था के प्रमुख मोहित रॉय ने एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक लेखिका की वापसी नहीं, बल्कि कोलकाता के सांस्कृतिक गौरव का उत्सव है। साल 2007 में तत्कालीन वामपंथी (लेफ्ट फ्रंट) सरकार ने कट्टरपंथी ताकतों और उपद्रवियों के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए थे और एक बंगाली लेखिका को शहर छोड़ने पर मजबूर किया था, लेकिन यह एक नया बंगाल है जहां किसी भी प्रकार की कट्टरता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस ऐतिहासिक गरिमामयी कार्यक्रम में खुद राज्य के नवनियुक्त मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच साझा करेंगे। हालांकि, जब आयोजकों से यह तीखा सवाल पूछा गया कि क्या तस्लीमा अब हमेशा के लिए इसी शहर में बसने वाली हैं, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल उनके स्थायी निवास को लेकर कोई अंतिम निर्णय या आधिकारिक बातचीत नहीं हुई है।
बीजेपी के लिए बड़ा वैचारिक हथियार बनी तस्लीमा की वापसी; वोट बैंक की राजनीति पर साधा निशाना
कोलकाता: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तस्लीमा नसरीन की वापसी के जरिए सत्ताधारी दल राज्य में एक बहुत बड़ा और दूरगामी राजनीतिक संदेश देने की पुरजोर कोशिश कर रहा है:
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राजनीतिक फुटबॉल नहीं बनना चाहतीं लेखिका: अतीत में तस्लीमा नसरीन ने अपने एक इंटरव्यू में बड़े ही दुखी मन से कहा था कि वे किसी भी राजनीतिक दल के हाथों की कठपुतली या राजनीतिक फुटबॉल नहीं बनना चाहतीं। एक साहित्यकार होने के नाते उन्हें सिर्फ शांतिपूर्वक पुस्तक मेलों, साहित्यिक उत्सवों और गोष्ठियों में शामिल होने की बुनियादी आजादी मिलनी चाहिए।
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पुरानी हुकूमतों को घेरा: भाजपा के शीर्ष नेताओं ने इस मुद्दे पर तत्कालीन वामपंथी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकारों को आड़े हाथों लिया है। उनका आरोप है कि पिछली सरकारों ने केवल अपने विशेष वोट बैंक को सुरक्षित रखने और तुष्टिकरण की नीति के तहत तस्लीमा को कभी बंगाल की सीमा में घुसने नहीं दिया, जबकि वे लगातार इस शहर को अपना घर बताते हुए वापस आने की गुहार लगाती रही थीं।
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संसद में भी गूंजी थी आवाज: इस बड़े कदम की पटकथा पिछले साल ही लिखी जाने लगी थी, जब भाजपा के राज्यसभा सांसद और बंगाल इकाई के वरिष्ठ नेता समिक भट्टाचार्य ने देश की संसद में केंद्र सरकार के समक्ष तस्लीमा की सुरक्षा और उनकी बंगाल वापसी का मार्ग प्रशस्त करने की पुरजोर वकालत की थी। उन्होंने तस्लीमा नसरीन को वैश्विक स्तर पर इस्लामिक कट्टरपंथ और लैंगिक असमानता के खिलाफ उठने वाली एक बेहद निर्भीक और मजबूत आवाज करार दिया था।
1994 में छूटा था बांग्लादेश और 2007 में सेना की मौजूदगी में छोड़ना पड़ा था कोलकाता; जानिए संघर्ष की पूरी दास्तान
कोलकाता: तस्लीमा नसरीन का संपूर्ण जीवन साहित्य, संघर्ष, विवादों और निर्वासन की एक बेहद दर्दनाक कहानी रहा है:
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'लज्जा' उपन्यास के बाद जारी हुआ था फतवा: 90 के दशक की शुरुआत में तस्लीमा ने अपने लेखन के जरिए पितृसत्तात्मक समाज, धार्मिक रूढ़िवादिता और महिलाओं के दमन पर बेहद तीखे प्रहार किए थे। जब उनका कालजयी उपन्यास 'लज्जा' (जिसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस की प्रतिक्रिया स्वरूप बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हुए अमानवीय अत्याचारों और दंगों का सजीव चित्रण था) प्रकाशित हुआ, तो पड़ोसी देश के कट्टरपंथी भड़क उठे। उनके खिलाफ जान से मारने के कई फतवे जारी किए गए, जिसके कारण जान बचाने के लिए 1994 में उन्हें मजबूरी में बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था।
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कोलकाता को माना था अपना दूसरा घर: यूरोप और अमेरिका के विभिन्न देशों में लगभग 10 साल तक शरणार्थी की तरह भटकने के बाद, वे साल 2004 में भारत आईं और उन्होंने कोलकाता को अपना ठिकाना बनाया। बंगाली भाषा और संस्कृति से गहरा जुड़ाव होने के कारण वे इस शहर को हमेशा अपने दिल के सबसे करीब और अपना दूसरा असली घर मानती थीं।
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2007 का वह हिंसक ब्लैक फ्राइडे: साल 2007 में जब उनकी बहुचर्चित आत्मकथा 'द्विखंडितो' प्रकाशित हुई, तो उसके कुछ अंशों को लेकर कुछ विशेष संगठनों ने कोलकाता की सड़कों पर हिंसक तांडव मचा दिया। दंगे और आगजनी इस कदर भड़क उठे कि शहर की तत्कालीन सरकार को स्थिति नियंत्रित करने के लिए सेना (फ्लैग मार्च) बुलानी पड़ी थी।
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जयपुर से दिल्ली तक का सफर: उस समय की बुद्धदेव भट्टाचार्य की वामपंथी सरकार ने कानून-व्यवस्था और सुरक्षा का हवाला देते हुए तस्लीमा नसरीन को रातों-रात कोलकाता छोड़ने का आदेश दे दिया था। उन्हें पहले सुरक्षा घेरे में जयपुर भेजा गया और फिर वे देश की राजधानी दिल्ली चली गईं। तब से लेकर अब तक वे दिल्ली में ही एक अज्ञात और कड़े सुरक्षा घेरे वाले स्थान पर रह रही हैं, जहां भारत सरकार उन्हें लगातार लंबी अवधि का रेजिडेंट परमिट (Long-term Resident Permit) प्रदान कर रही है। अब 19 साल बाद उनकी कोलकाता वापसी को लेकर शहर के बौद्धिक और राजनीतिक हलकों में उत्साह और कौतूहल दोनों चरम पर हैं।
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