कुर्सी की लड़ाई या जातीय राजनीति? प्रतिमा बागरी के बयान से मचा हंगामा
भोपाल। मध्य प्रदेश में एक मंत्री द्वारा अपनी कुर्सी और जाति प्रमाण पत्र को बचाने के लिए छुआछूत जैसी सामाजिक कुप्रथा का सहारा लेने का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी ने खुद को अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग का साबित करने के लिए दावा किया है कि आज भी समाज में ब्राह्मण, ठाकुर और राजपूत जैसी उच्च जातियां बागरी समाज के साथ भेदभाव करती हैं और उनके घरों में भोजन तक नहीं करतीं। मंत्री के मुताबिक, यह भेदभाव ही इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि बागरी समाज किसी राजपूत या ठाकुर उप-जाति का हिस्सा नहीं है, बल्कि पूरी तरह अनुसूचित जाति वर्ग के अंतर्गत आता है।
जाति छानबीन समिति के सामने पेश किया दावा
मंत्री प्रतिमा बागरी ने यह विवादित दलील जाति प्रमाण पत्र की सत्यता जांचने वाली उच्च स्तरीय (अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र) छानबीन समिति के समक्ष दी। उन्होंने अपने पक्ष में करीब 110 साल पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज और 20 से अधिक विभिन्न तर्क प्रस्तुत किए। समिति ने इन दलीलों और साक्ष्यों को आधार मानते हुए मंत्री को क्लीन चिट दे दी और उन्हें एससी वर्ग का पात्र माना है। समिति ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि नागौद के अनुविभागीय अधिकारी द्वारा 7 फरवरी 2004 को जारी किया गया एससी जाति प्रमाण पत्र पूरी तरह वैध है। इसके साथ ही समिति ने शिकायतकर्ता व कांग्रेस अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार के दावों को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके बाद अहिरवार ने अब इस फैसले को अदालत में चुनौती देने की बात कही है।
कैबिनेट में साथ बैठने और छुआछूत के दावे पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद मंत्री बागरी के छुआछूत वाले दावे पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार के एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए, जहाँ उन पर समाज से छुआछूत जैसी कुरीतियों को खत्म करने की नैतिक जिम्मेदारी है, वहीं खुद को साबित करने के लिए ऐसी दलील देना चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि वे हर मंगलवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री सहित ठाकुर और ब्राह्मण समाज के कई अन्य मंत्रियों के साथ बैठती हैं। इसके अलावा, उनकी अपनी रैगांव विधानसभा सीट के स्थानीय लोगों का भी कहना है कि मंत्री लगातार क्षेत्र में होने वाले शादी-विवाह और सामाजिक कार्यक्रमों में सभी जातियों के लोगों के घर आती-जाती रही हैं।
प्रयागराज के पंडों की वंशावली और पुराने दस्तावेज आए काम
समिति के सामने खुद को सही साबित करने के लिए प्रतिमा बागरी ने वर्ष 2004 में जारी अपने मूल हस्तलिखित और डिजिटल जाति प्रमाण पत्र के साथ-साथ वंशावली और पूर्वजों के राजस्व रिकॉर्ड पेश किए। उन्होंने अपने परदादा रामगोपाल बागरी के समय के वर्ष 1916 के पुराने सरकारी दस्तावेज और प्रयागराज (इलाहाबाद) के पंडों के पास सुरक्षित वंशावली के रिकॉर्ड भी सौंपे। समिति ने इस मामले में सतना कलेक्टर और एसपी स्तर पर जांच कराने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के पुराने फैसलों और आदिम जाति अनुसंधान संस्थान मध्य प्रदेश के अध्ययनों का भी हवाला दिया। अंततः यह माना गया कि बागरी जाति का राजपूत वर्ग के साथ कोई रोटी-बेटी का संबंध नहीं है।
राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू
समिति का फैसला आने के बाद इस मामले पर सियासत भी गरमा गई है। क्लीन चिट मिलने पर राहत जताते हुए राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी ने कहा कि उन्हें कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा जानबूझकर फंसाने की साजिश रची गई थी, जबकि सबको पता है कि सतना जिले में बागरी समाज कभी राजपूत वर्ग का हिस्सा नहीं रहा। अब समिति के फैसले से पूरी तरह दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है। दूसरी तरफ, शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने सीधे तौर पर सरकार पर पक्षपात के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने समिति को सरकार द्वारा ही पूर्व में जारी आदेशों की प्रतियां सौंपी थीं, लेकिन शासन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मंत्री बागरी को इस मामले में बचा लिया है।
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